चौंकिए मत यहाँ खुलेआम लगती है बेटियों की बोली, चंद रुपयों की खातिर बिकती हैं दुल्हन!

बेटीयाँ जिसे ईश्वर का खुबसुरत उपहार कहा जाता है, जो आज परिवार की हर खुशी का आधार है। जिस बेटी के जन्म को घर में लक्ष्मी का आगमान हमारे देश में माना जाता है आज वहीं बेटीयाँ एक अजिब वेदना में हैं। खुलकर तो कुछ नहीं बोलती, लेकिन इनकी आँखे ही दबी ज़ुबान में कई सवाल पुछते हैं।आखिर ये समाज आज भी बेटीयों पर इतना निमर्म क्यों है ? आखिर क्यों इन्हें आज परंपराओं की बेडीयों में कसकर बाज़ार में बिकनें के लिए क्यों धकेला जा रहा है। इन सबके बीच भी कई बेटीयाँ है जो हर रोज़ खामोशी से तील तील कर मर रहीं हैं। उनके उपर परंपरा की ऐसी बेडीयाँ कस दी गई हैं की वो उफ्फ तक नहीं कर सकती । हर बार उन्हें बाजा़र में खडा किया जा रहा हैं। हर बार उनकी बोली लग रही है। आज उनकी जिंदगी किसी खिलौनें से भी बद्तर है। शायद आपको य़किन ना आए । हमें भी नहीं था । लेकिन जो हक़कित हमारे सामनें भी आया उसे देखकर सुनकर हम भी सन्न रह गए की क्या आज की इस 21वीं सदी में क्या वाकई बेटीयाँ इतनी कमज़ोंर हैं की परंपरा के नाम उन्हे बाजा़र में चंद रूपयों के लिए बेचा जाए । वो भी उनके द्वारा जिन्हें वो बाबा कहती हैं भाईया पुकारती है। जिनके कंधों पर इनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी है । ऐसी ही कई बेटीयों का दर्द हम आपको दिखानें जा रहे हैं । बतानें जा रहे हैं ऐसी हक़कित जिसे इस समाज नें आज तक नहीं देखा।

मुंबई यानि देश की आथर्कि राजधानी से 6 सौ 50 किलोमिटर दुर नांदेड शहर में। नांदेड दक्कन के पठार में गोदावरी नदी के तट पर बसा नांदेड़ महाराष्ट्र का प्रमुख शहर। मध्यकाल में बहमनी, निजामशाही, मुगल और मराठों ने यहां शासन किया। गुरू गोविन्द सिंह का जन्मदिन यहां बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। राज्य सरकार ने इसे पवित्र शहर घोषित कर रखा है। इसी शहर से शंकर राव चह्वान दो बार मुख्यमंत्री रहे। और उनके बेटे और कॉग्रेस के कद्दावर नेता अशोक चह्वाण भी 8 दिसंबर 2008 से 9 नवंबर 2010 तक मुख्यमंत्री के गद्दी पर रहे । नांदेड शहर को इनका गढ माना जाता है । लेकिन इनके ही गढ और जिस इलाके से ये पिछले कई सालों से विधानसभा चुनाव जीत कर आते रहे हैं । ये कडवी हक़ीकत इनके ही क्षेत्र का है । शहर से महज़ 13 कि मी दुर अर्धा पुर गाँव और अशोक चहवाण का चुनावी क्षेत्र। अर्धा पुर गाँव की आबादी करीब 35 हज़ार लोगों की है । ज्यादातर यँहा रहने वाले लोग वैधु समाज से आते हैं। वैधु समाज यानि कामगार और छोटे मोटे काम कर जिंदगी गुज़ारनें वाले लोग। लेकिन इस गाँव की कडवी सच्चाई भी है। जिसे जानकार भी आज सब अंजान बनें बैठे हैं ।

इस गाँव में परंपरा के नाम बाजार में बेटियों की शादी के नाम पर उनका खिलौनों की तरह बाजार की तरह नुमाइश किया जा रहा है उनकी बोली लगाई जा रही है। हवाला ये दिया जाता है की ये उनकी परंपरा है और जिसे भी शादी करनी होगी वो बाजा़र में जाकर अपनी दुल्हन घर लानें के लिए बोली लगाए । जिसकी जितनी बडी बोली लगेगी उसे उतनी अच्छी दुल्हन मिलेगी। वो भी उतने दिनों के लिए जब तक वो उसे रखना चाहे। विडंबना देखिए ये बोली कोई और नहीं बल्कि खुद लडकी के पिता और भाई लगवाते हैं। इन सबके बीच  इस सौदे में हर रोज कोई न कोई बेटी अपना सम्मान खो रही है। लेकिन, इन बेटियों का दर्द सराकर का तो छोडिए उन कानों तक भी नहीं पहुंच पा रहा है जो बेटियों को खिलौना न समझने की हिदायत दे रहे हैं।

परंपरा के नाम पर लडकियों के सम्मान के सौदे की भनक लगी यह सुनकर इस पर विश्वास करने की हिम्मत नहीं हुई। क्या यह बात महज अफवाह थी या इसमें कोई हकीकत थी। यह जानने के लिए अब खुद को रोक पाना नामुमकिन सा था। इसीलिए हम निकल पडे मुंबई से 600 किलोमीटर दूर स्थित अर्धापुर गांव की ओर। जिस दिन हम अर्धापुर पहुंचे 15000 लोगों की इस बस्ती में मौजुद सभी लोग किसी बडे मेले में जुडे थे। मेला सुनकर जो तस्वीर हमने अपने दिलो दिमाग में बनाई थी मेले में पहुंचते न सिर्फ वो तस्वीर मिट गई बल्कि जो इन आखों ने देखा उसपर यकीन करना मुमकिन नहीं था। लोगों की भीड, भीड में लग रही थी बोलियां कभी 20 हज़ार तो कभी 30 हजार बोली कभी कभी 50 हजार तक चली जाती।  बोली के साथ लोगों में बहसबाज़ी भी जारी थी। आखिर क्या था यह मेला और किस पर लग रही थी बोलियां।  यह जानने के लिए जैसे ही हमने वहां खडे लोगों से पूछा तो पता चला कि मेले में दुलहनें खरीदी और बेची जा रही है।

लडकी का पिता खुद मेले में आता है, अपनी लडकी के लिए मेले में निलामी की प्रक्रिया शुरू करता है। 15 से 16 साल लडकी को खरीदने के लिए वहां मौजुद लडकों के पिता अपनी हैसियत के हिसाब से बोली लगाते है। जिसकी बोली सबसे ज्यादा होती है उसी मेले में लडके के साथ लडकी की शादी की रस्म अदायगी होती है। पंचायत कोरे कागज पर यह फरमान सुना देता है कि जिस शख्स ने सबसे ज्यादा जिस लडकी के लिए बोली लगाई है वो उसी शख्य के साथ जाएगी। अगर लडकी को उस लडके को छोडना भी होगा तो पंच ही तय करेगा कि अगली बार उस लडकी कीमत क्या होगी। और वह कितने वक्त तक अपने नए साथी के साथ रह सकती है। इस काम में शामिल लोगों के लिए कानून और कायदा कोई मायने नहीं रखता। पंच ने जो फैसला कर दिया वही आखिरी फैसला होता है।  जिस किसी ने भी पंच के फैसले को तोडने की कोशिश की उसे नतीजा भी भुगतना पडता है। इतना ही नहीं इस पूरी डील पर कागजी करार भी किया जाता है।

लड़कियां भी खुद को मजबूर पाती हैं वो चाहकर भी कुछ नहीं कर सकतीं। ऐसी ही एक लड़की स्वाति (बदला हुआ नाम) से जब हमने बात की तो उसने बस इतना ही कहा की , जो चल रहा है सब सही है।  पिता जो चाहते हैं उसी के हिसाब से होता है हमारे समाज में ऐसा ही होता है।


 
ऐसी ही एक दुल्हन खरीदने वाले लड़के संजय राजा ने बताया की, इस रुढीवादी परंपरा में जकडी बेटियों के लिए मदद के हाथ सामने आना तो चाहते है। लेकिन पंचायत के तुगलकी फरमान के सामने हार मान लेना ही बेहतर समझते है। जिन लडकों को लडकियां बेची जाती है वो शिक्षित भी है और वो इस परंपरा के विरोध में भी हैं। मगर वो खुलकर विरोध करने की ताकत जुटा नहीं पाते। शायद इस डर से कि उनके भी घर में उनकी अपनी बहन है और पंचायत के फरमान से उनका जीना दुर्भर हो सकता है। वो खुद नहीं चाहते कि सरेआम बाजारों में लडकियां बेची जाए और वो उन्हें अपनी दुल्हन बनाकर चंद सालों के लिए अपने साथ रखे।

 
अर्धापुर की पंचायत सालों से इस परंपरा को समाज के लिए बेहतर मानती है।उन्हें बेटियों का मंडी में बिकना जरा भी नहीं चौंकाता। उल्टे वो तो इस बात कि हिमायत करते है कि जो इस तरह अपनी बेटियों को बेचता है असल में वो ही रिवाजों के पालन करता है। जो ऐसा नहीं करते पहले तो उनके साथ मारपीट होती है । फिर गांव से उनका हुक्का -पानी बंद कर दिया जाता है और फिर भी न माने तो गांव से बेदखल कर दिया जाता है। 


 विडंबना तो इस बात की है कि बेटियों -महिलाओं का उत्थान करने का ठेका लेनेवाले महिला -विकास विभाग को भी अर्धापुर में सालों से चले आ रहे है इस बेतुके रिवाज में पीसती लडकियों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। कहने को तो इस विभाग का काम बेटियों पर हो रहे किसी भी प्रकार के अत्याचार पर आवाज उठाना है। सरकारी महकमों तक गंभीर मुद्दों को संज्ञान में लाना है पर यह क्या कोई मुद्दे उठाते जिन्हें िस बात की जानकारी नहीं।

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